Anya / अन्य

“Anya (अन्य )” Other, is one among a set of three stories I wrote as reflections on the urban experiences. Although these were intense experiences, I found it difficult to articulate them in academic language that would communicate effectively to a larger audience.

This story, Anya (अन्य), dwells on how different identities are embedded in different city spaces and how, based on our own identities, we either accept them or get unnerved by them. The very streets, buildings, walls of cities where we dwell manifest the biases we carry within ourselves.”

कल रात से सीमा की ख़ुशी का तो ठिकाना ही नहीं था. पूरे एक साल बाद वो रजनी से मिली.

सीमा की शादी को दो साल हो चुके हैं, अब तो उसका एक साल का एक बच्चा भी है, अंकु. आखिरी बार वो रजनी से एक साल पहले उसकी ही शादी में मिली थी. किस्मत की ही बात थी वो भी. क्योकि बच्चे की डिलीवरी मायके में ही हो रही थी, इसी लिए वो रजनी की शादी में आ पायी. कितना रोई थी ये बचपन की सहेलियाँ कि पता नहीं अब कहाँ और कब ही मिलेंगी.

सीमा का पति नॉएडा में काम करता था, और रजनी का ससुराल हैदराबाद में होने वाला था. हरिद्वार में फिर से दोनों का एक ही समय में होना तो लगभग नामुमकिन ही था.

पिछले हफ़्ते जब सुरेश ने बताया कि उसको ऑफिस के काम से दो दिन के लिए, हैदराबाद से कुछ १०० कि.मि. दूर जाना है, तो सीमा के मन में एक उम्मीद जागी. उसने रजनी को फ़ोन किया तो पता चला उसका पति भी एक महीने के लिए बाहर गया हुआ है. अब सीमा ऐसा मौका कैसे हाथ से जाने दे. उसने जैसे तैसे सुरेश को मना ही लिया साथ चलने के लिए. वो रजनी के यहाँ दो दिन के लिए रुक जाएगी, जब तक सुरेश फील्ड में अपना काम ख़तम कर लेगा. वैसे भी जब से अंकु पैदा हुआ है, सीमा का कहीं भी आना जाना बंद हो चुका है.

कल रात वो लोग आखिरकार हैदराबाद पहुंच ही गए. अपनी सहेली से मिलने कि ख़ुशी में सीमा ने आने के पहले जाने क्या क्या नहीं खरीद डाला, क्या क्या खाने को बनाया साथ ले कर चलने को. सुरेश ने उसे रजनी के यहाँ छोड़ा, चाय नाश्ता किया और रात ही में निकल गया. दोनों सहेलियों ने रात भर गप्पे मारे. थक कर आज तो अंकु भी आराम से सो गया वक़्त पे, बीच में बस एक बार उठा.

सीमा की अगली सुबह अपनी सहेली के घर पे हुई. कुछ ही घंटो की नींद के बावजूद दोनों थकने वाले नहीं थे. दो ही दिन तो मिले थे साथ में. आज का दिन गुज़रा आस पास घूमने में. सीमा को बहुत ख़ुशी तो थी रजनी से मिलने की मगर उसके घर के बाहर का इलाका उसको असहज कर रहा था. पता नहीं कैसे मोहल्ले में रुकी हुई है रजनी भी. गली की शुरुआत में ही मांस कि दूकान, फिर टोपी और सुरमा लगाए आदमी जगह जगह, उसको लग रहा था सब उसी को देख रहे हैं. अजीब ही है सब. हरिद्वार से तो अलग होना ही था, मगर नॉएडा से भी काफी अलग था ये शहर. खैर बचपन की गलियों की यादों में, गंगा किनारे करी गयी शैतानियों की बातो में ही ज़्यादातर वक़्त कट गया. मगर फिर भी, सीमा ने जाने के पहले एक बार तो इस बारे में बात करने की सोची.

दुसरे दिन की सुबह दूधवाला नहीं आया, और शनिवार था तो सीमा को मंदिर भी जाना था. दोनों सहेलियाँ नीचे उतरी अंकु को गोद में उठाये. कुछ कदम साथ चलने के बाद, रजनी ने सीमा को बगल वाली गली के मंदिर का रास्ता दिखाया और बोली की वो तब तक दूध और कुछ सब्जी ले कर आती है, वैसे भी अभी वो नहायी नहीं थी तो मंदिर नहीं जा पायेगी. रास्ता सरल था, सीमा को अगली गली में घुसते ही मंदिर तो नहीं मगर फूल माला बेचती दुकाने दिख गयी. कुछ कदम चलने पर धूप की महक के साथ, घंटो कि आवाज़े भी आने लगी. और संकरी होती गयी गली में दुकानों के बाहर लटकी लाल सुनहरी चुन्नियों और लॉकेटों के नीचे से सरकती हुई, जबरदस्ती सामान बेचने के लिए घसीटते दुकानदारों से बचते हुए, बच्चे को गोद में उठाये वो मंदिर पहुंची. यहाँ के मंदिर थोड़े अलग थे, कई चटक रंगों से पुते हुए. सीमा यहाँ की भाषा तो नहीं समझी मगर आराम से दर्शन कर कर के प्रसाद लेकर वापस बाहर की ओर निकलती है.

अंकु भी अब शरारत के मूड में आ चुका था, गोदी में चिपके चिपके कभी सीमा कि बिंदी नोचता, कभी मंगलसूत्र, तो कभी चूड़ी. परेशानी और हंसी के बीच में खोयी हुई सीमा मंदिर वाली गली के बाहर आ गयी. मुड़कर कुछ कदम बढाती ही है कि फिर से वहाँ का माहौल उसे असहज कर देता है. हे भगवान्, कैसे ही लोग हैं, औरतें सर से पैर तक मनहूस से काले रंग में छुपी, दीवारे अजीब सी फीकी, आदमी मानो सारे उसको घूरते हुए. वो बच्चे को थोड़ा और कस के छाती से लगाकर और सर नीचे झुका चलती रहती है. उसे लगता है पीछे से कोई आवाज़ दे रहा है, पलट कर देखा, तो एक सफ़ेद कुर्ते में लम्बी सी दाढ़ी वाला आदमी मुस्कुराता हुआ उसकी तरफ बढ़ रहा है. उसकी धड़कनो के साथ पांव कि रफ़्तार भी तेज़ हो गयी, और वो सीधे घर कि तरफ बढ़ती है. उफ़, कहाँ ही आ गयी मैं, रजनी के साथ ही रहना चाहिए था. वो आदमी फिर से बुलाता है. हद्द है बेशर्मी कि, दिन दहाड़े इस तरह छेड़ छाड़! ये लोग तो होते ही ऐसे हैं. वो जल्दी से इधर उधर देखती है, कि कोई है जिससे वो मदद मांग सके, मगर जिसको देखो एक से बढ़ के एक. सीमा काफी घबरा जाती है, कुछ कदम का रास्ता जो रजनी के साथ ऐसे ही कट गया था उसको ज़िन्दगी की सबसे लम्बी दूरी लग रही है अब. वह लगभग बदहवास हो कर अब चल क्या दौड़ ही रही थी. ये आदमी तो अब भी पीछे आ रहा है. सीमा देखती है, कि सामने रजनी का घर आ ही गया है. आखिरी पांच कदम तो वो दौड़ती ही है, दरवाज़ा खोलने के लिए मुड़ी तो देखा वो आदमी भी दौड़ के लगभग उसके पास तक आ गया है. घर का दरवाज़ा पकड़ कर उसको थोड़ी हिम्मत आती है, ठान लिया था की अब पलट कर सुना देगी. वो कुछ बोलती कि आदमी ही हाँफते हुए बोल पड़ा, “अरे मैडम कितना दौड़ा दिया आपने.” वो गुस्से में बोलने ही वाली थी कि वो जेब से कुछ निकाल कर हाथ उसकी ओर बढ़ाता है. सीमा झटके से पीछे होते हुए देखती है, ये तो उसी का मंगलसूत्र है. वो हिचकिचाते हुए उसके हाथ से लेती है, तो आदमी बोला, “ये आपके बच्चे के खींचने से नीचे गिर गया शायद, और आप हैं कि रूकती ही नहीं. क्या स्पीड में एकदम दौड़े हीच जा रही”, वो हँसता है.

सीमा को २ सेकंड लगते हैं समझने में कि क्या हुआ, वो अजीब सी मुस्कराहट के साथ, सर झुका के बुदबुदाते हुए थैंक यू बोलती है और गेट को अंदर से लॉक करके, किनारे वाली दीवार पे टिक कर गहरी सांस लेती है. फिर धीमे कदमों से सीढ़ियों की तरफ बढ़ जाती है.

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